मुझे रिन्द कहने का जो बदगुमान रखतें है।
वाक़िफ नहीं है वो अपनी ग़शी निगाहों से।
~ विकास
(रिन्द- पक्का शराबी)
(बदगुमान- भ्रम रखतें है)
(ग़शी- बेहोशी)
मुझे रिन्द कहने का जो बदगुमान रखतें है।
वाक़िफ नहीं है वो अपनी ग़शी निगाहों से।
~ विकास
(रिन्द- पक्का शराबी)
(बदगुमान- भ्रम रखतें है)
(ग़शी- बेहोशी)
यू तो लिखी है हर जमाने ने कविताएँ .
पर उन शहीदों की लिखावट महान थी।
जवानी मे लोग करते है इश्क की चाहते.
उनके इश्क मे ही देश आजादी की पहचान थी।
सीने मे जलते वो बेतकल्लुफ़ी के शोले.
आशिक-ए-बेताब इन वीरों की वजा़ थी।
हजारों जो बहके थे इन्कलाब के प्याले से.
तेवर मे उनके बिजली सी गरजा थी।
टुटे ना वो, इक आह न निकली जबान से.
जो जिन्दा रखे थी उनकों वो ही लिखावट उनकी पहचान थी।
एक सपना जो था उन जवान आखों मे.
हिन्द हो आजाद अपना, हिन्दीयों का राज हो.
यू तो लिखी है हर जमाने ने कविताएँ .
पर उन शहीदों की लिखावट महान थी।
(बेतकल्लुफ़ी- आजादी से)
(वज़ा- निर्माण )
~विकास
हर रोज करता था जतन जिस का,
उसके लिए आज मेरा इमतेहान है,
तुम सो जाओ मुझे इन तारों से कुछ काम है।
मेरे प्यार मे तेरीे हार की तारीख़ गुमनाम है,
चाँद के पास पड़ी तेरी कुंडली मे गडबडी का प्रोग्राम है,
तुम सो जाओ मुझे इन तारों से कुछ काम है।
साम,दाम,दंड,भेद सब का इंतजाम है,
हासिल ही एक मात्र मरहम-गुज़ार है,
तुम सो जाओ मुझे इन तारों से कुछ काम है।
(मरहम-गुज़ार:- मरहम लगाने वाला)
~विकास
थी प्यारी, जो प्यारी हम खुद में समझते,
उस प्यारी, ने हमारी ,प्यारी निन्दे ही चुरा ली।
~विकास~
»जिन्दगीं-ए-मेरीं में अहकाम हमेशाई आई...
जो ना चाहा कभी हमनें, वो ही रुसवाई आई...!
(अहकाम-आज्ञाएँ/आदेश)
»मुझे हर उस चीज से मुहब्बत है जो मुझसे जुदा है...
क्युं की जुदा चीज़ की जुदाई तकलीफ़ नहीं देती ...!
»जो हम हारें तो कुछ ना होगा खोने को,
जीत पर तो बंदे आसमां हमारा होगा ।
»मन-ए-रोवाइ मे आँसूओं को गढ़ देता हुँ...
शब्द देकर इन्हें कागजों को भर लेता हुँ..!
»तेरी यादों से उभरने का उपाय मिल गया है मुझे.
अब जब भी टुटता हुँ, घर मयखाना बना देता हुँ।
»तेरा आना मलहम था गहरे जख्मों पर मेरे.
अब तेरा जाना एक छाले सी चुभन है।
»नहीं लगता मन अब मेरा,अपने गरीबखाने में.
कीं लग जाता हुं रौज ..
अफसाने को हकीकत बनाने में...
» तहकीक-ए-मर्ज़ तो कीजिए जनाब...
क्यों हर बात पे इलाही इलाही किये फ़िरते हो।
(तहकीक-ए-मर्ज़ :-दुख के कारण की खोज).
» ऐ मेघों बरसों इस अदब से की नीर पीर बनजाए.
कि जमाने को भी समझने दो किस खता का नतिजा यह है।
» किरोधों गत मुझे ए जमानें वालों.
में आदमी सच्चा हूँ।
मुझे बेहुदगी को मजबूर ना करों
मे बेजुबा अच्छा हूँ|
»निगाहें टिक जाती है क्या खुब बनाए अजुबें मोला।
देखे तो दिक्कत ना देखे तो तोहिन है तेरी।
»किसी कि याद जों रोग बन जाए
इच्छा यह कि वो लौट आए.
दवाऔं से अब उब चुके है हम.
कोई उनसे हमारा इलाज तो करवाऐ।
» दर पर तेरा मुरीद सांई.
रहम कर या कहर कर ।
»हमारा हुनर हमारे मिजाज पर आर्शीत है.
हिजाबों से निकल कर आज्माऐं तो पता चलें।
अब इंतहा तभी होगी जब इंतकाल होगा,
कुछ पल और रुके तो बवाल होगा,
खबर पक्की है उनके आने की,
जो रुक गए अब भी जान-ए-बुराहाल होगा।
फिर बरसने को,वो दिन आ गए है.
हम चलतें चलतें वहीं आ गए है।
मिले थे जो कुछ, लम्हें खुशी के.
भिगोने को अब नीरद, ले नीर आ गए है।
ये थम थम कर जो हो रही है बारिश.
तबियत को तंग ये ना आज करदे।
कि अब ना रही है उभरने की हिम्मत.
इरादों ने अभ्यर्पण अब कर दिये है।
हसीन जिन्दगी क्या है...?
बतातें है...
सुबह जब आँख खुले तो माँ अपने हाथों की बनीं लाल चाय लिये सामने हों...
और मौसम उस निराकर इश्वर के झरने के बरसते बैरंग मोतियों से खिल उठा हो...
बैकग्राउंड मे(गुलशन अरा शईद का- तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे, मै एक शाम चुरा लु अगर बुरा ना लगे) चल रहा हो...
आप सोच रहे होगें की गाना मैच नहीं कर रहा है.... पोईंट तो है... पर आपके बाप का क्या जा रहा है, हमें पसंद है गाना... बात खत्म।
आगें बड़ते है... फिर छतरी लेकर जान बुझ के भीगते हुए दुध लेने जाना... तैयार होकर सहारा जाना और मरवाना...(मतलब काम करना)...
दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाना...(खास कर जो हमें पसंद हो/खुद्दार जो ठहरें)...
शिफ्ट खत्म होने के बाद कुत्तों की तरह जीभ निकाल कर ट्रेन के लिए भागना...
घर पहुच कर औनलाईन वार्ता करना और देर रात सोना...
माफी चाहुँगा अगली दिन सोना(12:00 के बाद तो अगला दिन ही होता है)..
ये है हसीन जिन्दगी...!
फोन कि घंटी बजी...हैलो, जी पापा ट्रेन 2 घंटे लेट है आप चिन्ता मत करिये में आ जाऊगी।
घर पहुचते ही मां ने रीति की नजर उतारी...
वहीं कौने से आवाज आई... कैसी हो मैंडम, पुरी बदल गई हो, कटरिना लग रही हो जी...
हाय प्रिया कैसी हो( गले लगते हुए)...बोले तो बिलकुल झकास...
आप बताईये कैसा रहा..(रीति- क्या) (प्रिया-सफर यार और क्या)...
ड़ोरबैल बजी... रीति भागते हुए पापा जी आ गए...
पैर छुते हुए... कैसे हो आप(आँख मे आंशु आ जाते है...6 महीने बाद देख रहा हु तुझे... चलो फरेश हो कर आईये खाना रेड़ी है... हम्म
प्रिया- और सुनाऔ जी क्या हाल है आपका... सब अच्छा है...
रीति-तू तो बात मत कर कभी फोन कर के खबर ली है मेरी...
प्रिया-औ हैलो मैंडम डेली करती थी, तू ही प्रिंस चाल्स के ख्यालों मे डुबी रहती थी तो मे क्या करु...
तभी प्रिया का फोन बजता है...हैलो,
औह भाई, कैसे हो, कहा हो, कभी घर भी आ जाऔ( एक ही सांस में)...
क्या घर आऐ हो... अंग्रेजी में (वट आ प्लेजेन्ट सरप्राईज) अभी आई...
रीति- कौन था ?
प्रिया- कजिन
ओके...
चलो बाय मिलते है कल ओके... रीति- हम्म बाय...
प्रिया के घर पर... औ तेरी बंदे ये कौन है मां इतना हैंडसम... (कबीर की टाग खींचते हुए)
कैसे हो कबीर...
मस्त आप कैसे हो दी...
अच्छी हु भाई...
कैसी चल रही है स्टडी...
गुड...
(प्रिया हसते हुए)-और गर्लफरेंड
क्या यार आप भी ना...(शरमाते हुए)
ओके...चलो खाना खा लेते है।
अगली सुबह चलो कबीर तुम्हे घुमा कर लाती हु...
5 मिनट रुकिये दी मे रेंड़ी हो जाता हु...
प्रिया-ओके... बट डू ईट फास्ट...
(5 मिनट बाद)
कबीर- चलिऐ ...
रीति के घर- आंटी जी रीति कहा है... उपर अपने कमरे मे है, जाऔ बैटा जगा कर नीचे ले आना, मै तो 4 बार जगा चुकी हु उठती ही नही पगली...
ये कौन है बैटा (कबीर को देख कर)
मेरा कजीन है आंटी कल ही आया है इलाहाबाद से...
कबीर- नमस्ते आंटी जी...
नमस्ते बैटा...(हसते हुए)
रीति कमरे से आते हुऐ...
कौन है मां...
प्रिया है...
उपर ही आजा मौटी(कबीर को बिना देखे हुए)
थोडी देर बाद...
रीति- नीचे देखते ही- भागते हुए कमरे में जाती है...(कबीर को देख कर) प्रिया पीछे भागती है...
प्रिया- क्या हुआ ?
रीति की धड़कने गतिमान से भी तेज...
कुछ नहीं...
वो सारे लम्हें जो रेल के एक सफर ने दिए (चमेली की खूशबू जैसे) ताजा हो गए।
कबीर- बिना बताए घर लोट आया...
(दोनों ने एक दुसरे को देख लिया)
एक अजीब अहसास ने दोनो को जकड़ रखा था...दोबारा मिलने की खुशी या पागलपन का दौरा नहीं मालुम...
प्रिया घर आई और आते ही कबीर पर बरस पड़ी...
बिना बताए क्यु आ गऐ तुम...
शाम तक माहौल तुफान के आगमान से पहले जैसा था... तुफान तो आना था...
उधर रीति मन ही मन कबीर से मिलने को आँख भर देखने को बेताब थी।
सुबह रीति प्रिया के घर जाती है...
कबीर बैटा नास्ता कर लो (आन्टी की आवाज)
रीति की सांस फुलते हुए, थोडी सहमी सी चुपचाप प्रिया के कमरे मे...
तु कब आई...
आभी...
कबीर को खिड़की के कौने से देखते हुए...
ये कौन हे...?
कबीर मेरा कजीन...
औह...(मन ही मन लौटरी लग गई)
प्रिया ने रीति के हावभाव पर गौर किया...
पसंद है...(मजाक करते हुए)
क्या, क्या, नहीं, वो, मै (हकलाते हुए)
प्रिया ने माहौल को समझ कर... (इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया वरना रीति भी चीज थी काम की...) हसते हुऐ...
क्या बकवास कर रही है तु, बिलकुल पागल है क्या।
प्रिया- बुलाऊ उसे...
क्या नहीं नहीं...(घबराते हुऐ)
प्रिया- कॉलम डाऊन बेबी..
दोनों घुमने चली जाती है...
प्रिया-(शाम को कबीर को फौन चैक करते हुऐ)
ये क्या कबाड़ भर रखा है तुमने...
कबीर क्या ...
गानों के नाम...
1)आप को देख कर देखता रह गया (जगजीत सिंह)
2)आभी जा आभी जा (चन्दन दास)
3)आज जाने की जिदद ना करों ( श्फाकत आमानत अली)
4)आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है...
5)अखियों के झरोखों से...
6)ए-हुस्न-ऐ, बेपरवा तुझे शबनम कहू सोला कहू (गुलाम अली)
7)चुपके चुपके रात दिन (गुलाम अली)
8)हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद (नयारा नुर)
9)हम तेरे शहर में आऐ है मुसाफिर की तरह ( गुलाम अली)
10) इसारों इसारों मे दिल लेने वाले ( आशा जी)
11)तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे (गुलाम अला शईद)
12) ये ना थी हमारी किश्मत.......
क्या है ये सब कबीर...?
कबीर चुप...
आशिक हो गए हो...
मौका देख कर
प्रिया- (चुटकी लेते हुए...रीति को जानते हो)
कबीर- हा, क्या, कौन, कैसे, किसे, नहीं, पता नहीं (लाल-पीली शक्ल के साथ)
प्रिया- बस बस शांत भाई... (हस्ते हुऐ)
प्रिया- कैसी लगी (मजे लेते हुए)
कबीर- स्टोप इट....(हस्ते हुए)
अगले दिन—
प्रिया- कबीर मुझे शौपिंग करनी है चलोगें...
कबीर- औके...
प्रिया- रीति से शौपिंग चले (फौन पर)
रीति- कहा पेसेफिक मॉल... औके जल्दी आना...
मॉल में---(अचानक)
रीति और कबीर आमने सामने...
प्रिया (मौका देख रफूचक्कर)
रीति- हॉय....(हक्लाते हुए) (मन ही मन मिलने की खुशी को महसुस करते हुए)
कबीर- (दुनिया की सबसे हसीन लडकी को देखते हुए उसकी बातों का जवाब देना भूल गया)
रीति- कबीर कैसे हो ( दोबारा)
कबीर- हॉय/हैलो (एक साथ, खुशी से पागल)
रीति- कभी सोचा नही था ऐसे मिलेगे...
कबीर- हा बिलकुल...
(प्रिया- छुप कर देखते हुए)
कबीर- तुम कैसी हो...?
रीति- अच्छी...(सोचते हुए की कबीर ने ट्रेन मे कुछ नही कहा शायद अब कह दें)
5 मिनट तक शांति का माहौल...
कबीर- (सोचते हुए की रेल के एक सफर ने उसे हम सफर दें दिया)
आँखो मे गंगा-जमुना का पानी लिये दोनों संगम को राह तकते रहे...
12 घंटे का रेल सफर, 7 जन्मों के पवित्र सफर को बेकरार था...
आखिरकार 10 मिनट थमने के बाद पृथ्वी फिर चल पडी (बस दोनों के लिए)
कबीर- रीति (लंबी सांस लेने के बाद)
रीति- हा कबीर...
कबीर- मेरी हमसफर बनोगीं (एक झटके में)-(आँखे थोड़ी नम)
रीति- सोचतें हुए की ये कैसे हुआ, क्या हुआ,
करोड़ो के बीच खास होने का अहसास, सभी इच्छाओं का एक साथ पुरा होना, (मानों आसमां के चाँद-सितारों ने एक साथ कदम चुम लिये हो... इस से पहले रीति ने ये अहसास कभी महसुस नही किया था)
कबीर ने दोहराया- रीति मेरी हमसफर बनोंगी...?
रीति- मैं तुम्हारी ही हु.........(खुशी के इस लम्हें को एक सरल शब्द से स्वीकारते हुऐ अपनी आखिरी सासों तक का फैसला)
गर मर भी जाऊँ.
तो युही ना फुँक देना.
मेरे अंग तरंग को किसी मे सींच देना.
तमन्ना बड़ी थी जीने की मगर.
ये साँस ही सिमित थी.
चार दिन जीने के तकदीर मे लिखी थी.
गर मर भी जाऊँ।
सींचे अंग मेरे किसी के काम आएंगे.
बेरंग दुनिया किसी की रंगों से भर जाएगी.
दौड़ेगी धड़कन किसी की.
कई बदन रंग पाएगे.
गर मर भी जाऊँ.
तो युही ना फुँक देना.
मेरे अंग तरंग को किसी मे सींच देना।
शिक्षा ग्रहण करने की कोई जगह नहीं होती। इसी सोच को जीवीत करने का प्रमाण विद्या गेलरी ने दिया है। शनिवार 9 अप्रैल दरियागंज स्थित जैन बाल आश्रम मे विटी सोल ने विद्या गेलरी की मदद से दो दिन का क्विलिंग कार्यशाला का आयोजन किया। जिसमे बच्चो को कागज से कलाकृति सिखाया गया। दो दिन की कार्यशासा मे पहले दिन उन्हे कागज से कार्ड बनाना सिखाया गया और अगले दिन प्रतियोगिता का आयोजन हुआ।
आश्रम के बच्चो ने इस कार्यशाला मे कागज से कार्ड बनाने के कुछ नए तरीके सीखे। क्विलिंग तकनिक बच्चो को कुछ नई लगी जीसे उन्होने बडी़ ही रूची के साथ सीखा। रविवार को प्रतियोगिता मे अपनी प्रतिभा दिखाते हुऐ बच्चो ने ग्रिटिंग कार्ड बनाए। पुलकित ने पहला स्थान प्राप्त किया वही वितलव जैन दुसरे स्थान पर रहै। विद्या गेलरी ने बच्चों को पुरस्कृत कर उनका मनोबल बढ़ाया व भविष्य मे क्विलिंग तकनिक से कला के क्षेत्र मे उन्नति की कामना की।
जैन बाल आश्रम के सेक्रेटरी नीरज जैन ने विद्या गेलरी का इस कार्यशाला व प्रतियोगिता के लिए आभार व्यक्त किया और उनके समाज के प्रति क्रतव्यों की शराहना की। इस मौके पर आयोजक विटी सोल के विद्या, मानशी, म्रिदुला, शुभम, विकास व सेक्रेटरी नीरज जैन मौजुद रहे।
हमारी खामोशी से लोग समझते है हमे कुछ अाता ही नही है उन्हे क्या पता अनुभवी लोग बस अनुभव करते है।
एक अनजान शहर की गलियां तब तक अपरिचित लगती है जब तक उनमे कोई जाना चहरा ना हो ओर फिर सिलसिला रोंदने का होता है जो गलियों से अपना पन बड़ाता है। यह तजुरबा सबने किया होगा। मुझे ये तब हुआ जब नवमीं कक्षा मे प्रवेश लेना था। क्योकिं हमारे पिता जी केन्द्रिय सरकार के नौकर है इसलिए हमे लगभग कुछ वर्षों मे अलग अलग शहरों मे रहने व उन्हे जानने समझने का अवशर मिलता रहता है।
तो यह बात है 2011 की एक शहर से दुसरे शहर जाने का मोसम था हम अपना नया ठिकाना देखने गए और कुछ दिनों मे वहा रहने भी लगे। अब बारी थी पढ़ाई लिखाई की सो घुमने लगे प्रवेश के लिए और प्रवेश मिला भी।असली अनुभव की बारी तब आई जब सोलह वर्ष का लड़का अपने नए नवेले स्कूल मे पहले दिन ये सोच के जाता है कि कुछ अच्छा हो परन्तु पहला दिन फिकी चाय के समान कोई मजा नही बस ना चाहते हुए भी मुँह दबी के पी जाऔं।
आगे बड़ते है दुसरा दिन स्कूल मे एक एेसे खुसनुमा, गमों से परे, शान्त व शालिन चहरे की झलक जिसने हमे (स्कूल जाने का नशा करा दिया) इसे समझियेगा क्योकि सोलह वर्ष/ वो भी लडका स्कूल जाने को बेकरार नशे को महसुस कजिए। आमतौर पे माँ/बाप को लगता है की उनका बेटा पढा़ई को लेकर गंभीर है परन्तु इतना सुलझा पन वो भी अचानक सच मे गंभीर है। उस चहरे ने हमने मजबुर कर दिया की हम वो चहरा भूले नहीं। उस झलक मे इतनी गहराई थी की हम करोड़ो मे उस चहरे को पहचान सकते थे वो भी बस एक झलक में।
(स्वर्गीय निदा फजली जी ने फरमाया है:-मेरी आखों ने चुना है तुझे दुनिया देख कर, किस का चहर अब मे देखू तेरा चहरा देख कर)
कुछ एेसे ही हालात हो गऐ थे हमारे किसी और की तरफ देखने का सवाल ही न था। खुदा भी मसती मे थे और फिर एक करिशमा हुआ वो और हम एक ही बगिया के फूल निकले। कमाल हुआ एक दम गजब। फिर क्या होना था रोज सुबह सबसे पहले अपनी एटलस लेकर पहुँच जाते स्कूल उस नगिनें की चमक देखने को उसे देख कर जो सुकुन मिलता था क्या बताए बस यू समझ लो जलती धूप मे ठंडी छाँव। ये सिलसिला दो वर्षों का था जिसमे हमने पुरे चार (४) अंग्रेजी में four (4) बार बात की बड़ा आन्नद का अनुभव हुआ था माँ कसम। और फिर वो किसी दुसरी बगिया की रोनक बनी और हमने भी किसी दुसरी जगह प्रवेश लेना उचित समझा। दो वर्षों का अनुभव है बाकी कभी और बताऐगे।
"अनाथ" शब्द का अनुवाद कुछ एेसा है। 'अ' माने 'बिना' और "नाथ" माने 'मालिक' । वह व्यक्ति जिसका कोई मालिक या मुखिया ना हो। आज हम एक एेसे हि आश्रम मे गए उस जगह का माहौल किसी मिलिट्री कैप के समान था। पढ़ने को लाईबरेरी, खाने की जगह किसी मिलिट्री मैस, समारोह के लिए हाल व सबसे विचित्र तब लगा जब बच्चों से मिलने को सेक्रेटरी से लिखित अनुमती । जैसे वो बच्चे नही कोई विदेशी प्राणी है जो आम जन के संपर्क मे आते ही बीमार या उनके प्राणपखेरू ऊड़ जाएगे। छोड़िए ये बात पर उन बच्चों का चहरा देख ऐसा लग रहा था मानो उनहे अब आदत हो गई है खुद को किसी एंटीक कि तरह दिखाऐ।
उनके चहरा मानो पुरी दास्ता बया कर रहे थे। बचपने कि मस्ती, चुलबुला पन, एक रोब से हक माँगने की अदा, नाराजगी, मोहोबत, मानो सारे भाव बस एक ख्वाब हो। हँसीं बस दिखाने को ताकी वार्तालाप सहज बनी रहे। कुछ नही बहुत कुछ खोया है इन बच्चों ने। संसार मे लाने वालो ने बस लाकर ही महान बन गए परन्तु नाही खुद माँ या पिता का सुख भोगा ना ही इन कलियों को सिचा। कमी बहुत महसुस हुई पर सबसे बड़ी यही कि समाज से जोडो़, संसार से जोड़ो। इनकी आवाज मे उस सहारे को झलकने दो जो इनके लिए पिता या माँ के रहने पर महसुस होती है। बाते मेरी भी बड़ी है पर कुछ को तो पिता नामक पेड़ की छाव देने की ललक सी जगी है। बड़े प्यारे चहरे है देखेगे आप ... लिजिए देखिए।
मेरी खामौशी, मेरी मजबुरी है महज.
लोग तो मजबुरी मे आत्मदाह कर बैठते है।
तेरा चंचल स्वभाव है, कमजोरी मेरी.
लोग इस स्वभाव पर बातों का आगाज कर बैठते है।
तहजीब निगाहों की तेरी, बंदिस बन गई मेरी.
लोग इन निगाहों से प्यार कर बैठते है।
मुख्य अड़चने भारत में बड़ती जनसंख्या, जातिवाद, भेदभाव, परिवारवाद, राजनीति में तुछ सोच रखने वाले लोग व आरक्षण कि सुविधा का अपने वोट बैंक के लिए अवधिर्विधि करने वाली सरकारे ।
⊙
1)
बड़ती जनसंख्या किसी भी उभरते देश के रास्ते की अड़चन बन सकती है. किसी भी घनी जनसंख्या वाले उभरते देश की मुश्किल है उसकी जनसंख्या को नियंत्रित रखना।
2)
जनसंख्या र्विधि को नियंत्रित करने के लिए लोगो को जागरुक करना व उनका देश के प्रति कर्तव्यों से सजग कराना।
3)
युवाऔ को देश की सम्पति मान कर उनका पालनपौशन करना, व युवाऔ का देश के प्रति कर्तव्यों का अहसास कराना।
4)
जनसंख्या को नियंत्रित करने के कठोर कानुन लाना भारत के लिए एक चुनौती।
⊙
1)
69 वर्ष आजादी के बाद भी भारत जातिवाद से निपटने मे विफल रहा है।
2)
जाति को भारत में व्यक्ति के पहचान के रुप में प्रयोग किया जाता है, जैसे कि पुलिस के कामकाज में सबसें पहले व्यक्ति की जाति पुछी जाती है।
3)
इस प्रकार कि कार्य शैली किसी भी देश को एक धागे में नही पिरो सकती।
4)
जाति आधारित जनगणना एक भदा उदहारण है, जनगणना में भला जाति का क्या काम।
5)
संख्या (जन) कि बड़ती है और जन में सभी लोग होते है इसमें जाति आधारित गणना करना अनुचित है।
⊙
1)
भेदभाव किसी भी रुप में हो वह हमेसा विकास कि गति को धीमा करेगा।
2)
उदहारण के तोर पर उतर भारत में बिहार प्रात के लोगो के साथ सोतेला व्यवहार का होना।
3)
महाराष्ट्र में उतर भारतिंयो सें वैसा ही व्यवहार होना जैसे उतर भारतीय बिहार के लोगो से करतें है।
4)
धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के बावजुद हिंदु, मुसलिम में भेदभाव व कट्टरपन का होना।
5)
भेदभाव का उदहारण(photo-1)
⊙
1)
राजनीति में परिवार को आड़ बनाकर चुनाव लड़ना और अवसर के अनुसार चलना देश हित में नही हैं।
2)
नीजि व्यवसायों में अपनें परिवार के व अपनें जानकारो को भर्ती करवाना व पक्ष लेना।
⊙
1)
तुछ सोच रखने वाले लोग देश के विकास में रोड़ा है, उनकी सोच उनके विवेक को दरसाती है।
2)
राजनीति में तुछ सोच के साथ आज कल के नेता बस अपनी जेब भरने आते है।
3)
किसी भी देश हित के मुद्दे पर ये लोग एकत्रित होने में अरसों लगा देते है परन्तु अपने वेतन र्विधि के प्रस्ताव को रातों रात एक सुर में स्वीकृति देने में एक हो जाते है।
⊙
1)
आज आरक्षण देश के लिए जहर बन रहा है, आर्थिक तौर पर मजबूत समाज भी आरक्षण की मांग करने लगा है।
2)
संविधान में आरक्षण 10 वर्ष के लिए दिया गया और इसे 10 वर्ष के बाद आरक्षित वर्ग के हालातों को देखते हुए इस सुविधा को बड़ाना या खत्म करना सरकार कि जिम्मेदारी रखी गई।
3)
परन्तु इस सुविधा का सरकारों ने अपनी वोट बनाने के लिए ज्यादा प्रयोग मे लिया बजाए कि इसे शोषित वर्ग का कल्याण कर के इस सुविधा को खत्म करने के।
मखातिर :-
ए खुदा मुखातिर करवा, तु मेरी रहबर से कर रहा हु उसकी ख्वाहिश जान दिल सब से।
हो गया हु मे बेरुख जग की खीदमत से, मुझ पर रहम कर, दे मुझे जीवन का फलसफा
मे भी जीऊ कुछ इस तरह, करता। रब्बा तेरे मिलने कि दुआ।।
तुझे कैसे बताऊ
:-
अपना भविष्य बनाने को मुझे तुझे रिझाना है,
कौशिश करता हु तुझे पाने कि ,पर तु बेश किमती खजाना है,
बिन मेहनत खजाना पाऊ कैसे, तुझे अपना बनाऊ कैसे,
इक अनजान डर रखता हु बिन बोले भी ना रह सकता हुँ।
बचपन
:-
क्या कसुर था मेरा, जो मुझे बड़ा कर दिया.
मेरी बचपन कि खुसियो को यु धुआ कर दिया,
अनजान था में, योवन कि उसझनो सें,
जब कि गलती, तो कहते हो गुनाह कर दिया
·मुनासिब ना समझा उन्होने सुननी अरदास मेरी।
पहुंचते ही दरबार मे बाहर का रास्ता दिखा दिया।।
·ये पुन्य कर्म है या है किश्मत मेरी।
जब भी निकलता हूँ घर से उनका दीदार होता है।
·कर तो दू मै उसकी चाहत पूरी ।
बस शरत-ये की वो मंजुरी दें दें ।।
·लिखना चाहता था उनकी अदाओ पे किताब में।
अफसोस बिन लिखे में इतिहास हो गया।।
·अब ना रहे आवाम, बन चुके है शासन हम।
हमारे आदेशो की कदर करना सीखो।।
·ये गरज है उस घटा के।
जो बरसने पर राहत देते है।।
·वो एक जुनुन था जो गुजर गया।
अब बस हम है और वजुद मेरा
·हमारी शायरी के कायल जमाने ने।
हमारे जख़्मों पर दाद दिए है।
·अहसान के समंदर में, अहसास तेरा एक मोती है।
तुझे पाने की चाहत लेकर,अब कुद पड़ा हुं सागर में।।
·कलम भी रुक गई मेरी, यू तेरे इंतजार मे ।
मौका दे इसे लिखने का, मुखतीर हो भरे बाजार में।।
· वो फितुर मेरे जहन मे कुछ यू उतरा हैं,की उसकी शक्सियत ने मुझे जकड़ कर पकड़ा है।
· वो नजारा भी क्या नजारा है, जिसमें चेहरा ना तुम्हारा है।
· ख्वाहिश ऊची है, जीगर मे दम है.
एक मौका तो दो, हम क्या किसी से कम है।।
Dekte h ye jawani kya gul khilayegi.
Ham banege kaabil ya phir GAALIB hi kahlayene..
कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।