Thursday, 14 April 2016

कला की कक्षा अनाथआश्रम में...

शिक्षा ग्रहण करने की कोई जगह नहीं होती। इसी सोच को जीवीत करने का प्रमाण विद्या गेलरी ने दिया है। शनिवार 9 अप्रैल दरियागंज स्थित जैन बाल आश्रम मे विटी सोल ने विद्या गेलरी की मदद से दो दिन का क्विलिंग कार्यशाला का आयोजन किया। जिसमे बच्चो को कागज से कलाकृति सिखाया गया। दो दिन की कार्यशासा मे पहले दिन उन्हे कागज से कार्ड बनाना सिखाया गया और अगले दिन प्रतियोगिता का आयोजन हुआ।
आश्रम के बच्चो ने इस कार्यशाला मे कागज से कार्ड बनाने के कुछ नए तरीके सीखे। क्विलिंग तकनिक बच्चो को कुछ नई लगी जीसे उन्होने बडी़ ही रूची के साथ सीखा। रविवार को प्रतियोगिता मे अपनी प्रतिभा दिखाते हुऐ बच्चो ने ग्रिटिंग कार्ड बनाए। पुलकित ने पहला स्थान प्राप्त किया वही वितलव जैन दुसरे स्थान पर रहै। विद्या गेलरी ने बच्चों को पुरस्कृत कर उनका मनोबल बढ़ाया व भविष्य मे क्विलिंग तकनिक से कला के क्षेत्र मे उन्नति की कामना की।
जैन बाल आश्रम के सेक्रेटरी नीरज जैन ने विद्या गेलरी का इस कार्यशाला व प्रतियोगिता के लिए आभार व्यक्त किया और उनके समाज के प्रति क्रतव्यों की शराहना की। इस मौके पर आयोजक विटी सोल के विद्या, मानशी, म्रिदुला, शुभम, विकास व सेक्रेटरी नीरज जैन मौजुद रहे।

Wednesday, 13 April 2016

बात अनुभव की...

हमारी खामोशी से लोग समझते है हमे कुछ अाता ही नही है उन्हे क्या पता अनुभवी लोग बस अनुभव करते है।

एक अनजान शहर की गलियां तब तक अपरिचित लगती है जब तक उनमे कोई जाना चहरा ना हो ओर फिर सिलसिला रोंदने का होता है जो गलियों से अपना पन बड़ाता है। यह तजुरबा सबने किया होगा। मुझे ये तब हुआ जब नवमीं कक्षा मे प्रवेश लेना था। क्योकिं हमारे पिता जी केन्द्रिय सरकार के नौकर है इसलिए हमे लगभग कुछ वर्षों मे अलग अलग शहरों मे रहने व उन्हे जानने समझने का अवशर मिलता रहता है।

तो यह बात है 2011 की एक शहर से दुसरे शहर जाने का मोसम था हम अपना नया ठिकाना देखने गए और कुछ दिनों मे वहा रहने भी लगे। अब बारी थी पढ़ाई लिखाई की सो घुमने लगे प्रवेश के लिए और प्रवेश मिला भी।असली अनुभव की बारी तब आई जब सोलह वर्ष का लड़का अपने नए नवेले स्कूल मे पहले दिन ये सोच के जाता है कि कुछ अच्छा हो  परन्तु पहला दिन फिकी चाय के समान कोई मजा नही बस ना चाहते हुए भी मुँह दबी के पी जाऔं।

आगे बड़ते है दुसरा दिन स्कूल मे एक एेसे खुसनुमा, गमों से परे, शान्त व शालिन चहरे की झलक जिसने हमे (स्कूल जाने का नशा करा दिया) इसे समझियेगा क्योकि सोलह वर्ष/ वो भी लडका स्कूल जाने को बेकरार नशे को महसुस कजिए। आमतौर पे माँ/बाप को लगता है की उनका बेटा पढा़ई को लेकर गंभीर है परन्तु इतना सुलझा पन वो भी अचानक सच मे गंभीर है। उस चहरे ने हमने मजबुर कर दिया की हम वो चहरा भूले नहीं। उस झलक मे इतनी गहराई थी की हम करोड़ो मे उस चहरे को पहचान सकते थे वो भी बस एक झलक में।

(स्वर्गीय निदा फजली जी ने फरमाया है:-मेरी आखों ने चुना है तुझे दुनिया देख कर, किस का चहर अब मे देखू तेरा चहरा देख कर)
कुछ एेसे ही हालात हो गऐ थे हमारे किसी और की तरफ देखने का सवाल ही न था। खुदा भी मसती मे थे और फिर एक करिशमा हुआ वो और हम एक ही बगिया के फूल निकले। कमाल हुआ एक दम गजब। फिर क्या होना था रोज सुबह सबसे पहले अपनी एटलस लेकर पहुँच जाते स्कूल उस नगिनें की चमक देखने को उसे देख कर जो सुकुन मिलता था क्या बताए बस यू समझ लो जलती धूप मे ठंडी छाँव। ये सिलसिला दो वर्षों का था जिसमे हमने पुरे चार (४) अंग्रेजी में four (4) बार बात की बड़ा आन्नद का अनुभव हुआ था माँ कसम। और फिर वो किसी दुसरी बगिया की रोनक बनी और हमने भी किसी दुसरी जगह प्रवेश लेना उचित समझा। दो वर्षों का अनुभव है बाकी कभी और बताऐगे।

Saturday, 9 April 2016

अनाथ, बस एक शब्द ही नही।

"अनाथ" शब्द का अनुवाद कुछ एेसा है। 'अ' माने 'बिना' और "नाथ" माने 'मालिक' । वह व्यक्ति जिसका कोई मालिक या मुखिया ना हो। आज हम एक एेसे हि आश्रम मे गए उस जगह का माहौल किसी मिलिट्री कैप के समान था। पढ़ने को लाईबरेरी, खाने की जगह किसी मिलिट्री मैस, समारोह के लिए हाल व सबसे विचित्र तब लगा जब बच्चों से मिलने को सेक्रेटरी से लिखित अनुमती । जैसे वो बच्चे नही कोई विदेशी प्राणी है जो आम जन के संपर्क मे आते ही बीमार या उनके प्राणपखेरू ऊड़ जाएगे। छोड़िए ये बात पर उन बच्चों का चहरा देख ऐसा लग रहा था मानो उनहे अब आदत हो गई है खुद को किसी एंटीक कि तरह दिखाऐ।
उनके चहरा मानो पुरी दास्ता बया कर रहे थे। बचपने कि मस्ती, चुलबुला पन, एक रोब से हक माँगने की अदा, नाराजगी, मोहोबत, मानो सारे भाव बस एक ख्वाब हो। हँसीं बस दिखाने को ताकी वार्तालाप सहज बनी रहे। कुछ नही बहुत कुछ खोया है इन बच्चों ने। संसार मे लाने वालो ने बस लाकर ही महान बन गए परन्तु नाही खुद माँ या पिता का सुख भोगा ना ही इन कलियों को सिचा। कमी बहुत महसुस हुई पर सबसे बड़ी यही कि समाज से जोडो़, संसार से जोड़ो। इनकी आवाज मे उस सहारे को झलकने दो जो इनके लिए पिता या माँ के रहने पर महसुस होती है। बाते मेरी भी बड़ी है पर कुछ को तो पिता नामक पेड़ की छाव देने की ललक सी जगी है। बड़े प्यारे चहरे है देखेगे आप ... लिजिए देखिए।

कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।

कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।