मुझे रिन्द कहने का जो बदगुमान रखतें है। वाक़िफ नहीं है वो अपनी ग़शी निगाहों से। ~ विकास
(रिन्द- पक्का शराबी) (बदगुमान- भ्रम रखतें है) (ग़शी- बेहोशी)
कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।