Saturday, 9 April 2016

अनाथ, बस एक शब्द ही नही।

"अनाथ" शब्द का अनुवाद कुछ एेसा है। 'अ' माने 'बिना' और "नाथ" माने 'मालिक' । वह व्यक्ति जिसका कोई मालिक या मुखिया ना हो। आज हम एक एेसे हि आश्रम मे गए उस जगह का माहौल किसी मिलिट्री कैप के समान था। पढ़ने को लाईबरेरी, खाने की जगह किसी मिलिट्री मैस, समारोह के लिए हाल व सबसे विचित्र तब लगा जब बच्चों से मिलने को सेक्रेटरी से लिखित अनुमती । जैसे वो बच्चे नही कोई विदेशी प्राणी है जो आम जन के संपर्क मे आते ही बीमार या उनके प्राणपखेरू ऊड़ जाएगे। छोड़िए ये बात पर उन बच्चों का चहरा देख ऐसा लग रहा था मानो उनहे अब आदत हो गई है खुद को किसी एंटीक कि तरह दिखाऐ।
उनके चहरा मानो पुरी दास्ता बया कर रहे थे। बचपने कि मस्ती, चुलबुला पन, एक रोब से हक माँगने की अदा, नाराजगी, मोहोबत, मानो सारे भाव बस एक ख्वाब हो। हँसीं बस दिखाने को ताकी वार्तालाप सहज बनी रहे। कुछ नही बहुत कुछ खोया है इन बच्चों ने। संसार मे लाने वालो ने बस लाकर ही महान बन गए परन्तु नाही खुद माँ या पिता का सुख भोगा ना ही इन कलियों को सिचा। कमी बहुत महसुस हुई पर सबसे बड़ी यही कि समाज से जोडो़, संसार से जोड़ो। इनकी आवाज मे उस सहारे को झलकने दो जो इनके लिए पिता या माँ के रहने पर महसुस होती है। बाते मेरी भी बड़ी है पर कुछ को तो पिता नामक पेड़ की छाव देने की ललक सी जगी है। बड़े प्यारे चहरे है देखेगे आप ... लिजिए देखिए।

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कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।

कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।