फोन कि घंटी बजी...हैलो, जी पापा ट्रेन 2 घंटे लेट है आप चिन्ता मत करिये में आ जाऊगी।
घर पहुचते ही मां ने रीति की नजर उतारी...
वहीं कौने से आवाज आई... कैसी हो मैंडम, पुरी बदल गई हो, कटरिना लग रही हो जी...
हाय प्रिया कैसी हो( गले लगते हुए)...बोले तो बिलकुल झकास...
आप बताईये कैसा रहा..(रीति- क्या) (प्रिया-सफर यार और क्या)...
ड़ोरबैल बजी... रीति भागते हुए पापा जी आ गए...
पैर छुते हुए... कैसे हो आप(आँख मे आंशु आ जाते है...6 महीने बाद देख रहा हु तुझे... चलो फरेश हो कर आईये खाना रेड़ी है... हम्म
प्रिया- और सुनाऔ जी क्या हाल है आपका... सब अच्छा है...
रीति-तू तो बात मत कर कभी फोन कर के खबर ली है मेरी...
प्रिया-औ हैलो मैंडम डेली करती थी, तू ही प्रिंस चाल्स के ख्यालों मे डुबी रहती थी तो मे क्या करु...
तभी प्रिया का फोन बजता है...हैलो,
औह भाई, कैसे हो, कहा हो, कभी घर भी आ जाऔ( एक ही सांस में)...
क्या घर आऐ हो... अंग्रेजी में (वट आ प्लेजेन्ट सरप्राईज) अभी आई...
रीति- कौन था ?
प्रिया- कजिन
ओके...
चलो बाय मिलते है कल ओके... रीति- हम्म बाय...
प्रिया के घर पर... औ तेरी बंदे ये कौन है मां इतना हैंडसम... (कबीर की टाग खींचते हुए)
कैसे हो कबीर...
मस्त आप कैसे हो दी...
अच्छी हु भाई...
कैसी चल रही है स्टडी...
गुड...
(प्रिया हसते हुए)-और गर्लफरेंड
क्या यार आप भी ना...(शरमाते हुए)
ओके...चलो खाना खा लेते है।
अगली सुबह चलो कबीर तुम्हे घुमा कर लाती हु...
5 मिनट रुकिये दी मे रेंड़ी हो जाता हु...
प्रिया-ओके... बट डू ईट फास्ट...
(5 मिनट बाद)
कबीर- चलिऐ ...
रीति के घर- आंटी जी रीति कहा है... उपर अपने कमरे मे है, जाऔ बैटा जगा कर नीचे ले आना, मै तो 4 बार जगा चुकी हु उठती ही नही पगली...
ये कौन है बैटा (कबीर को देख कर)
मेरा कजीन है आंटी कल ही आया है इलाहाबाद से...
कबीर- नमस्ते आंटी जी...
नमस्ते बैटा...(हसते हुए)
रीति कमरे से आते हुऐ...
कौन है मां...
प्रिया है...
उपर ही आजा मौटी(कबीर को बिना देखे हुए)
थोडी देर बाद...
रीति- नीचे देखते ही- भागते हुए कमरे में जाती है...(कबीर को देख कर) प्रिया पीछे भागती है...
प्रिया- क्या हुआ ?
रीति की धड़कने गतिमान से भी तेज...
कुछ नहीं...
वो सारे लम्हें जो रेल के एक सफर ने दिए (चमेली की खूशबू जैसे) ताजा हो गए।
कबीर- बिना बताए घर लोट आया...
(दोनों ने एक दुसरे को देख लिया)
एक अजीब अहसास ने दोनो को जकड़ रखा था...दोबारा मिलने की खुशी या पागलपन का दौरा नहीं मालुम...
प्रिया घर आई और आते ही कबीर पर बरस पड़ी...
बिना बताए क्यु आ गऐ तुम...
शाम तक माहौल तुफान के आगमान से पहले जैसा था... तुफान तो आना था...
उधर रीति मन ही मन कबीर से मिलने को आँख भर देखने को बेताब थी।
सुबह रीति प्रिया के घर जाती है...
कबीर बैटा नास्ता कर लो (आन्टी की आवाज)
रीति की सांस फुलते हुए, थोडी सहमी सी चुपचाप प्रिया के कमरे मे...
तु कब आई...
आभी...
कबीर को खिड़की के कौने से देखते हुए...
ये कौन हे...?
कबीर मेरा कजीन...
औह...(मन ही मन लौटरी लग गई)
प्रिया ने रीति के हावभाव पर गौर किया...
पसंद है...(मजाक करते हुए)
क्या, क्या, नहीं, वो, मै (हकलाते हुए)
प्रिया ने माहौल को समझ कर... (इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया वरना रीति भी चीज थी काम की...) हसते हुऐ...
क्या बकवास कर रही है तु, बिलकुल पागल है क्या।
प्रिया- बुलाऊ उसे...
क्या नहीं नहीं...(घबराते हुऐ)
प्रिया- कॉलम डाऊन बेबी..
दोनों घुमने चली जाती है...
प्रिया-(शाम को कबीर को फौन चैक करते हुऐ)
ये क्या कबाड़ भर रखा है तुमने...
कबीर क्या ...
गानों के नाम...
1)आप को देख कर देखता रह गया (जगजीत सिंह)
2)आभी जा आभी जा (चन्दन दास)
3)आज जाने की जिदद ना करों ( श्फाकत आमानत अली)
4)आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है...
5)अखियों के झरोखों से...
6)ए-हुस्न-ऐ, बेपरवा तुझे शबनम कहू सोला कहू (गुलाम अली)
7)चुपके चुपके रात दिन (गुलाम अली)
8)हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद (नयारा नुर)
9)हम तेरे शहर में आऐ है मुसाफिर की तरह ( गुलाम अली)
10) इसारों इसारों मे दिल लेने वाले ( आशा जी)
11)तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे (गुलाम अला शईद)
12) ये ना थी हमारी किश्मत.......
क्या है ये सब कबीर...?
कबीर चुप...
आशिक हो गए हो...
मौका देख कर
प्रिया- (चुटकी लेते हुए...रीति को जानते हो)
कबीर- हा, क्या, कौन, कैसे, किसे, नहीं, पता नहीं (लाल-पीली शक्ल के साथ)
प्रिया- बस बस शांत भाई... (हस्ते हुऐ)
प्रिया- कैसी लगी (मजे लेते हुए)
कबीर- स्टोप इट....(हस्ते हुए)
अगले दिन—
प्रिया- कबीर मुझे शौपिंग करनी है चलोगें...
कबीर- औके...
प्रिया- रीति से शौपिंग चले (फौन पर)
रीति- कहा पेसेफिक मॉल... औके जल्दी आना...
मॉल में---(अचानक)
रीति और कबीर आमने सामने...
प्रिया (मौका देख रफूचक्कर)
रीति- हॉय....(हक्लाते हुए) (मन ही मन मिलने की खुशी को महसुस करते हुए)
कबीर- (दुनिया की सबसे हसीन लडकी को देखते हुए उसकी बातों का जवाब देना भूल गया)
रीति- कबीर कैसे हो ( दोबारा)
कबीर- हॉय/हैलो (एक साथ, खुशी से पागल)
रीति- कभी सोचा नही था ऐसे मिलेगे...
कबीर- हा बिलकुल...
(प्रिया- छुप कर देखते हुए)
कबीर- तुम कैसी हो...?
रीति- अच्छी...(सोचते हुए की कबीर ने ट्रेन मे कुछ नही कहा शायद अब कह दें)
5 मिनट तक शांति का माहौल...
कबीर- (सोचते हुए की रेल के एक सफर ने उसे हम सफर दें दिया)
आँखो मे गंगा-जमुना का पानी लिये दोनों संगम को राह तकते रहे...
12 घंटे का रेल सफर, 7 जन्मों के पवित्र सफर को बेकरार था...
आखिरकार 10 मिनट थमने के बाद पृथ्वी फिर चल पडी (बस दोनों के लिए)
कबीर- रीति (लंबी सांस लेने के बाद)
रीति- हा कबीर...
कबीर- मेरी हमसफर बनोगीं (एक झटके में)-(आँखे थोड़ी नम)
रीति- सोचतें हुए की ये कैसे हुआ, क्या हुआ,
करोड़ो के बीच खास होने का अहसास, सभी इच्छाओं का एक साथ पुरा होना, (मानों आसमां के चाँद-सितारों ने एक साथ कदम चुम लिये हो... इस से पहले रीति ने ये अहसास कभी महसुस नही किया था)
कबीर ने दोहराया- रीति मेरी हमसफर बनोंगी...?
रीति- मैं तुम्हारी ही हु.........(खुशी के इस लम्हें को एक सरल शब्द से स्वीकारते हुऐ अपनी आखिरी सासों तक का फैसला)
Thursday, 14 July 2016
लप्रेक
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कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।
कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।
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