·मुनासिब ना समझा उन्होने सुननी अरदास मेरी।
पहुंचते ही दरबार मे बाहर का रास्ता दिखा दिया।।
·ये पुन्य कर्म है या है किश्मत मेरी।
जब भी निकलता हूँ घर से उनका दीदार होता है।
·कर तो दू मै उसकी चाहत पूरी ।
बस शरत-ये की वो मंजुरी दें दें ।।
·लिखना चाहता था उनकी अदाओ पे किताब में।
अफसोस बिन लिखे में इतिहास हो गया।।
·अब ना रहे आवाम, बन चुके है शासन हम।
हमारे आदेशो की कदर करना सीखो।।
·ये गरज है उस घटा के।
जो बरसने पर राहत देते है।।
·वो एक जुनुन था जो गुजर गया।
अब बस हम है और वजुद मेरा
·हमारी शायरी के कायल जमाने ने।
हमारे जख़्मों पर दाद दिए है।
·अहसान के समंदर में, अहसास तेरा एक मोती है।
तुझे पाने की चाहत लेकर,अब कुद पड़ा हुं सागर में।।
·कलम भी रुक गई मेरी, यू तेरे इंतजार मे ।
मौका दे इसे लिखने का, मुखतीर हो भरे बाजार में।।
· वो फितुर मेरे जहन मे कुछ यू उतरा हैं,की उसकी शक्सियत ने मुझे जकड़ कर पकड़ा है।
· वो नजारा भी क्या नजारा है, जिसमें चेहरा ना तुम्हारा है।
· ख्वाहिश ऊची है, जीगर मे दम है.
एक मौका तो दो, हम क्या किसी से कम है।।
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