ना जलते चिराग शान-ए-पीर के लिए.
गर पीर हयात के रहनुमा ना होते।
आज सावन की आखिरी बरसात हुई।
और मुझे तुम्हारा ख्याल आया।
ये बारिश
और तुम
अब अगले
बरस ही
आओगे।।
छोड़ के फिर जाओगे तुम,
इन सर्द हवा सी बातों को,
काटेंगे कैसे हम तन्हा,
उलझन संग अपनी रातों को,
क्या, डर रखते हो बर्बादी का,
या हो मेहरम तुम गैरों की,
चलो जातें जातें सुनते जाओ,
मिश्रा बन गईं हो तुम,मेरे शेरों की।
कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।