Thursday, 25 June 2020
कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।
कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी,
हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।
Friday, 24 April 2020
मंदिर मस्जिद
उसे क्या फर्क पड़ता है, मंदिर मस्जिद बन जाने में।
Monday, 21 August 2017
Tuesday, 8 August 2017
सावन, बरसात और तुम।।।
आज सावन की आखिरी बरसात हुई।
और मुझे तुम्हारा ख्याल आया।
ये बारिश
और तुम
अब अगले
बरस ही
आओगे।।
Thursday, 3 August 2017
मिश्रा बन गईं हो शेरों की।
छोड़ के फिर जाओगे तुम,
इन सर्द हवा सी बातों को,
काटेंगे कैसे हम तन्हा,
उलझन संग अपनी रातों को,
क्या, डर रखते हो बर्बादी का,
या हो मेहरम तुम गैरों की,
चलो जातें जातें सुनते जाओ,
मिश्रा बन गईं हो तुम,मेरे शेरों की।
Wednesday, 26 July 2017
चांद ही चांद!
1) देखा तो हमने भी एक चांद करीब से,
यकीनन उस पर दाग तो ना था।
2) चांद ही चांद है जमीं पर मगर!
मेरे चांद का नूर है कुछ अलग।
3) ये चांद भी कुछ तुम सा है!
कभी पूर्णिमा, कभी अमावस।
Friday, 21 July 2017
वो एक लड़की और दो शहर।
जून का महीना था। अभी कुछ दिन ही बीते थे कि इंटर्नशिप की टेनसन ने माथे को धर लिया। पीछले साल तो प्रिंट मिडिया में किसी तरह जुगाड हो गया था लेकिन "अब कि बार मोदी सरकार” माफ़ करना फ्लो में निकल गया।
इस बार टाइम पर इंटर्नशिप मिलना मुश्किल लग रहा था। काहे कि हम चंट बनने के चक्कर में अपना रिज्यूमे किसी चैनल में डालें ही नहीं उपर से सैर सपाटा करने को शिवगंगा पकड़े और पुश्तैनी गांव निकल लिए।
हमारे जिगरी मित्र हैं, नाम नहीं लेंगे नहीं तो पापुलर हो जाएंगे खामखां। मिडिया स्टुडेंट है हम, सब चीजों का ध्यान रखना पड़ता है।
जो हमारे मित्र हैं वो लगें थे इंटर्नशिप कि खोज में और हम रिश्तेदारों कि खोज में।
उन्हें तो इंटर्नशिप मिल गई लेकिन हमें रिश्तेदार नहीं मिले काहे कि हम चाहते ही नहीं है किसी से मिलना थोड़े अजीब किस्म के इंसान हैं हम।
तो हुआ यूं कि हमारे मित्र जी इंटर्नशिप ज्वाईन कर लिए और रोज हमें फोन पर डेली का न्युज देने लगें। दो चार दिन तो ठीक लगा लेकिन कुछ दिन बाद महसूस हुआ कि हमारी सुलग रही है।
हमारी रिटर्न जर्नी भी क्लोज थी तो सोचे कि घर पहुंचते ही इंटर्नशिप ज्वाईन कर लेंगे। इसी लिए हम भी अपना रिज्यूमे न्युज चैनल के एचआर लोगों को चिपकाने लगे कि कोई तो हमें रख लेगा। वैसे हम बड़ी काम कि चीज़ है हीं।
अंत में दो जगहों से रिस्पांस मिला, जब प्रापर बात किए तो मालूम पड़ा कि तीन महीना मरवाना पड़ेगा। इसे ड्राप कर दिए काहे की कोर्स की डिमांड 45 दिन की इंटर्नशिप करना थी।
अब टाइम भी बित रहा था तो अपने मित्र को बोलना पड़ा कहीं इंटर्नशिप देखने को वैसे हम जल्दी किसी की हेल्प नहीं लेना पसंद करते (खुदगर्ज जो ठहरे)
मित्र जी ने अपने ही चैनल के एचआर को मेल डाला कुछ दिन बाद रिस्पांस मिला और मालुम हुआ कि आवश्यकता होगी तो मौका दिया जाएगा। यें भी बड़ा बवाल है साला।
कुछ दिन बाद कॉल आया और मिलने को बुलाया गया। और फिर क्या था अगले ही दिन से हम भी (शिवाजी राव{नायक वाले}) कि तरह 1 महीने के लिए पत्रकार बन गए।
2 दिन बाद आईं कार्ड भी मिला अपना नाम पड़ कर बहुत खुशी मिली की हम भी किसी मिडिया हाउस के तथाकथित मेंबर है, ये बात अलग है कि वह चैनल दिवालिया हो चुका था।
हमें इंटर्नशिप के पहले दिन सुबह 10 बजे न्युज रुम में लेकर जाया गया। हमारी नजरें अभी न्युज रुम को देख ही रहीं थीं की हमें टाइपिंग के लिए ऑडर मिला, शेरों-शायरी का शोक रखते हैं तो थोड़ा बहुत टाइपिंग में ठीक थें सो जल्दी ही फारिख हो गए।
फिर जैसे ही नज़रों को कंप्यूटर स्क्रीन से हटाया तो देखा एक मासूम से चेहरे वाली मृगनयनी अपने काम में डुबी हुई थी, हम एक टक उसे ही निहारने लगे।
जून की बारिश ने अपना काम कर दिया, वो नशा हमको महसूस होने लगा।
शाम तक उस चहरे को हमने कई दफा पढ़ा, और कई दफा उन आंखों में डुब कर अपनी खुदगर्जी के लम्हों को खोजा,लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, 21 साल में पहली बार कोई जरूरत महसूस होने लगी थी।
ऐसा लगा जैसे हमारा मन बोल रहा हो कि अब बस हमारी इंटर्नशिप हो चुकी, जो सीखना था सीख चुके।
अब बस एक ही काम बचा था, उन आंखों को पढ़ने का। उस चहरे को ज़हन में उतारने का। पहला दिन बीत चुका और हमे पता भी नहीं चला।
अब हर दिन जरूरी लगने लगा। घर आने से पहले ऑफिस पहुंचने की जल्दी लगने लगी थी। पर हर बीतता दिन मायूसी के सिवा कुछ नहीं था।
टाइम को मानों बुलेट ट्रेन के पहिए लग गए हों।
समय को रोकने का दिल कर रहा था, या फिर दिन को सप्ताह, सप्ताह को महिना, महिने को साल बनाने का।
30 दिन का महिना भी अब कम लग रहा था,सोचने को मजबूर होना पड़ा कि महिना 30 का ही क्यों होता है।
उससे जुड़ी कुछ चीजें जो पहले समान्य सी थी अब उनसे गहरा नाता लगने लगा। दो शहर जो महिना पहले बस एक शहर थे वो अब सदी के महानगरों में तब्दील हो चुके थे। हर लब्ज में वहीं नाम।
लग रहा था जैसे देश अब वही से चलने वाला है, जैसे राजधानी बदल दी गई हो।
वो ऑफिस जो बंद होने को था, अब देश के लिए जरूरी लगने लगा था। मानो प्रधानमंत्री वहीं बैठा करेंगे।
देखते देखते इंटर्नशिप का टाइम पुरा हो गया, यह उनका ऑफिस में आखिरी दिन था और हमारी बैचेनी का पहला। अब उन्हें रोज देखने का कोई मौका नहीं था।
यह उनका ऑफिस में आखिरी दिन था, अभी आंख भर देखा भी नहीं कि 4 बज चुके थे, वो अपना इंटर्नशिप लेटर लेने जा रहीं थी, उनका दुर जाता हर एक कदम हमारी सांसों की रफ्तार को गति दे रहा था, वो सब कुछ लेकर अपने पीजी जा चुकी थी, पर हमारा कुछ अधुरा वहीं न्युज रुम के किसी कोने में रह गया था।
यह महिने का आखिरी दिन है वो सुबह सुबह रेलवे स्टेशन को निकल चुकी थी। लेकिन हमारी हालत कुछ अलग थी, घर के कोने में बैठे थे, सांस लेना मुश्किल हो रहा था, गला भरा भरा सा था, ऐसा लग रहा था कुछ छुट रहा हो, कोई बात जो अधूरी हो, कहना जरूरी हो।
चंद घंटों में सब कुछ बदल चुका था, वो अपने घर पहुंच चुकी थी। और हमारे पास बस वो 1 महीने की याद।
ये दिन किसी गहरे जख्म कि तरह हम से चिपक गया था।
दिन बीतते गए, पर हम एक जगह अटक चुके थे। ना चाहते हुए भी हमने 24 घंटे बस उसी के बारे में सोचा, बातें की, उसे अपनी यादों में, ज़हन में ज़िंदा किए रखा।
आज 1 साल होने को है पूरा साल हमने अपने दोस्त से इसी मर्ज पर चर्चा की।
अब हर वो चीज जो उस शख्स से जुड़ी है हमें बहुत अज़ीज़ हो गई है।
चाहे वो जुन हों ,ऑफिस हों, सड़के हों, या जून की बारिश।
वो एक लड़की और दो शहर अब किसी की दुनिया हो चुके हैं।।।
Monday, 3 April 2017
Wednesday, 29 March 2017
वो मां थी।
मैं सोता रहा, वो सहलाती रही।
मैं रोता रहा, वो चुप कराती रही।
मैं भागता रहा, वो बुलाती रही।
वो मेरी मां थी, जो सब जानती रही।
मैं बेबस रहा, वो समझाती रही।
मैं डरता रहा, वो हिम्मत बढ़ाती रही।
मैं गिरता रहा, वो संभालती रही।
वो मेरी मां थी, जो सब जानती रही।
आज मैं उसका गौरव हूं, वो मेरी पहचान।
मैं उसकी दौलत हूं, और वो मेरा मान।।
Saturday, 18 February 2017
इबादत उलफत की।
इबादत उलफत की रौजाना।
वफ़ात को एहतिमाम समझो।
~विकास
उलफत-love
वफ़ात-death
एहतिमाम-prepration
Saturday, 15 October 2016
१५/१०
मुझे रिन्द कहने का जो बदगुमान रखतें है।
वाक़िफ नहीं है वो अपनी ग़शी निगाहों से।
~ विकास
(रिन्द- पक्का शराबी)
(बदगुमान- भ्रम रखतें है)
(ग़शी- बेहोशी)
Wednesday, 14 September 2016
बात शहीदों की...
यू तो लिखी है हर जमाने ने कविताएँ .
पर उन शहीदों की लिखावट महान थी।
जवानी मे लोग करते है इश्क की चाहते.
उनके इश्क मे ही देश आजादी की पहचान थी।
सीने मे जलते वो बेतकल्लुफ़ी के शोले.
आशिक-ए-बेताब इन वीरों की वजा़ थी।
हजारों जो बहके थे इन्कलाब के प्याले से.
तेवर मे उनके बिजली सी गरजा थी।
टुटे ना वो, इक आह न निकली जबान से.
जो जिन्दा रखे थी उनकों वो ही लिखावट उनकी पहचान थी।
एक सपना जो था उन जवान आखों मे.
हिन्द हो आजाद अपना, हिन्दीयों का राज हो.
यू तो लिखी है हर जमाने ने कविताएँ .
पर उन शहीदों की लिखावट महान थी।
(बेतकल्लुफ़ी- आजादी से)
(वज़ा- निर्माण )
~विकास
Sunday, 28 August 2016
तारों से कुछ काम हैं।
हर रोज करता था जतन जिस का,
उसके लिए आज मेरा इमतेहान है,
तुम सो जाओ मुझे इन तारों से कुछ काम है।
मेरे प्यार मे तेरीे हार की तारीख़ गुमनाम है,
चाँद के पास पड़ी तेरी कुंडली मे गडबडी का प्रोग्राम है,
तुम सो जाओ मुझे इन तारों से कुछ काम है।
साम,दाम,दंड,भेद सब का इंतजाम है,
हासिल ही एक मात्र मरहम-गुज़ार है,
तुम सो जाओ मुझे इन तारों से कुछ काम है।
(मरहम-गुज़ार:- मरहम लगाने वाला)
~विकास
Saturday, 27 August 2016
~प्यारी
थी प्यारी, जो प्यारी हम खुद में समझते,
उस प्यारी, ने हमारी ,प्यारी निन्दे ही चुरा ली।
~विकास~
Saturday, 6 August 2016
...
»जिन्दगीं-ए-मेरीं में अहकाम हमेशाई आई...
जो ना चाहा कभी हमनें, वो ही रुसवाई आई...!
(अहकाम-आज्ञाएँ/आदेश)
»मुझे हर उस चीज से मुहब्बत है जो मुझसे जुदा है...
क्युं की जुदा चीज़ की जुदाई तकलीफ़ नहीं देती ...!
»जो हम हारें तो कुछ ना होगा खोने को,
जीत पर तो बंदे आसमां हमारा होगा ।
»मन-ए-रोवाइ मे आँसूओं को गढ़ देता हुँ...
शब्द देकर इन्हें कागजों को भर लेता हुँ..!
»तेरी यादों से उभरने का उपाय मिल गया है मुझे.
अब जब भी टुटता हुँ, घर मयखाना बना देता हुँ।
»तेरा आना मलहम था गहरे जख्मों पर मेरे.
अब तेरा जाना एक छाले सी चुभन है।
»नहीं लगता मन अब मेरा,अपने गरीबखाने में.
कीं लग जाता हुं रौज ..
अफसाने को हकीकत बनाने में...
» तहकीक-ए-मर्ज़ तो कीजिए जनाब...
क्यों हर बात पे इलाही इलाही किये फ़िरते हो।
(तहकीक-ए-मर्ज़ :-दुख के कारण की खोज).
» ऐ मेघों बरसों इस अदब से की नीर पीर बनजाए.
कि जमाने को भी समझने दो किस खता का नतिजा यह है।
» किरोधों गत मुझे ए जमानें वालों.
में आदमी सच्चा हूँ।
मुझे बेहुदगी को मजबूर ना करों
मे बेजुबा अच्छा हूँ|
»निगाहें टिक जाती है क्या खुब बनाए अजुबें मोला।
देखे तो दिक्कत ना देखे तो तोहिन है तेरी।
»किसी कि याद जों रोग बन जाए
इच्छा यह कि वो लौट आए.
दवाऔं से अब उब चुके है हम.
कोई उनसे हमारा इलाज तो करवाऐ।
» दर पर तेरा मुरीद सांई.
रहम कर या कहर कर ।
»हमारा हुनर हमारे मिजाज पर आर्शीत है.
हिजाबों से निकल कर आज्माऐं तो पता चलें।
Sunday, 31 July 2016
जान-ए-बुराहाल होगा...।
अब इंतहा तभी होगी जब इंतकाल होगा,
कुछ पल और रुके तो बवाल होगा,
खबर पक्की है उनके आने की,
जो रुक गए अब भी जान-ए-बुराहाल होगा।
Monday, 25 July 2016
उभरने की हिम्मत...!
फिर बरसने को,वो दिन आ गए है.
हम चलतें चलतें वहीं आ गए है।
मिले थे जो कुछ, लम्हें खुशी के.
भिगोने को अब नीरद, ले नीर आ गए है।
ये थम थम कर जो हो रही है बारिश.
तबियत को तंग ये ना आज करदे।
कि अब ना रही है उभरने की हिम्मत.
इरादों ने अभ्यर्पण अब कर दिये है।
Friday, 15 July 2016
हसीन जिन्दगी...
हसीन जिन्दगी क्या है...?
बतातें है...
सुबह जब आँख खुले तो माँ अपने हाथों की बनीं लाल चाय लिये सामने हों...
और मौसम उस निराकर इश्वर के झरने के बरसते बैरंग मोतियों से खिल उठा हो...
बैकग्राउंड मे(गुलशन अरा शईद का- तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे, मै एक शाम चुरा लु अगर बुरा ना लगे) चल रहा हो...
आप सोच रहे होगें की गाना मैच नहीं कर रहा है.... पोईंट तो है... पर आपके बाप का क्या जा रहा है, हमें पसंद है गाना... बात खत्म।
आगें बड़ते है... फिर छतरी लेकर जान बुझ के भीगते हुए दुध लेने जाना... तैयार होकर सहारा जाना और मरवाना...(मतलब काम करना)...
दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाना...(खास कर जो हमें पसंद हो/खुद्दार जो ठहरें)...
शिफ्ट खत्म होने के बाद कुत्तों की तरह जीभ निकाल कर ट्रेन के लिए भागना...
घर पहुच कर औनलाईन वार्ता करना और देर रात सोना...
माफी चाहुँगा अगली दिन सोना(12:00 के बाद तो अगला दिन ही होता है)..
ये है हसीन जिन्दगी...!
Thursday, 14 July 2016
लप्रेक
फोन कि घंटी बजी...हैलो, जी पापा ट्रेन 2 घंटे लेट है आप चिन्ता मत करिये में आ जाऊगी।
घर पहुचते ही मां ने रीति की नजर उतारी...
वहीं कौने से आवाज आई... कैसी हो मैंडम, पुरी बदल गई हो, कटरिना लग रही हो जी...
हाय प्रिया कैसी हो( गले लगते हुए)...बोले तो बिलकुल झकास...
आप बताईये कैसा रहा..(रीति- क्या) (प्रिया-सफर यार और क्या)...
ड़ोरबैल बजी... रीति भागते हुए पापा जी आ गए...
पैर छुते हुए... कैसे हो आप(आँख मे आंशु आ जाते है...6 महीने बाद देख रहा हु तुझे... चलो फरेश हो कर आईये खाना रेड़ी है... हम्म
प्रिया- और सुनाऔ जी क्या हाल है आपका... सब अच्छा है...
रीति-तू तो बात मत कर कभी फोन कर के खबर ली है मेरी...
प्रिया-औ हैलो मैंडम डेली करती थी, तू ही प्रिंस चाल्स के ख्यालों मे डुबी रहती थी तो मे क्या करु...
तभी प्रिया का फोन बजता है...हैलो,
औह भाई, कैसे हो, कहा हो, कभी घर भी आ जाऔ( एक ही सांस में)...
क्या घर आऐ हो... अंग्रेजी में (वट आ प्लेजेन्ट सरप्राईज) अभी आई...
रीति- कौन था ?
प्रिया- कजिन
ओके...
चलो बाय मिलते है कल ओके... रीति- हम्म बाय...
प्रिया के घर पर... औ तेरी बंदे ये कौन है मां इतना हैंडसम... (कबीर की टाग खींचते हुए)
कैसे हो कबीर...
मस्त आप कैसे हो दी...
अच्छी हु भाई...
कैसी चल रही है स्टडी...
गुड...
(प्रिया हसते हुए)-और गर्लफरेंड
क्या यार आप भी ना...(शरमाते हुए)
ओके...चलो खाना खा लेते है।
अगली सुबह चलो कबीर तुम्हे घुमा कर लाती हु...
5 मिनट रुकिये दी मे रेंड़ी हो जाता हु...
प्रिया-ओके... बट डू ईट फास्ट...
(5 मिनट बाद)
कबीर- चलिऐ ...
रीति के घर- आंटी जी रीति कहा है... उपर अपने कमरे मे है, जाऔ बैटा जगा कर नीचे ले आना, मै तो 4 बार जगा चुकी हु उठती ही नही पगली...
ये कौन है बैटा (कबीर को देख कर)
मेरा कजीन है आंटी कल ही आया है इलाहाबाद से...
कबीर- नमस्ते आंटी जी...
नमस्ते बैटा...(हसते हुए)
रीति कमरे से आते हुऐ...
कौन है मां...
प्रिया है...
उपर ही आजा मौटी(कबीर को बिना देखे हुए)
थोडी देर बाद...
रीति- नीचे देखते ही- भागते हुए कमरे में जाती है...(कबीर को देख कर) प्रिया पीछे भागती है...
प्रिया- क्या हुआ ?
रीति की धड़कने गतिमान से भी तेज...
कुछ नहीं...
वो सारे लम्हें जो रेल के एक सफर ने दिए (चमेली की खूशबू जैसे) ताजा हो गए।
कबीर- बिना बताए घर लोट आया...
(दोनों ने एक दुसरे को देख लिया)
एक अजीब अहसास ने दोनो को जकड़ रखा था...दोबारा मिलने की खुशी या पागलपन का दौरा नहीं मालुम...
प्रिया घर आई और आते ही कबीर पर बरस पड़ी...
बिना बताए क्यु आ गऐ तुम...
शाम तक माहौल तुफान के आगमान से पहले जैसा था... तुफान तो आना था...
उधर रीति मन ही मन कबीर से मिलने को आँख भर देखने को बेताब थी।
सुबह रीति प्रिया के घर जाती है...
कबीर बैटा नास्ता कर लो (आन्टी की आवाज)
रीति की सांस फुलते हुए, थोडी सहमी सी चुपचाप प्रिया के कमरे मे...
तु कब आई...
आभी...
कबीर को खिड़की के कौने से देखते हुए...
ये कौन हे...?
कबीर मेरा कजीन...
औह...(मन ही मन लौटरी लग गई)
प्रिया ने रीति के हावभाव पर गौर किया...
पसंद है...(मजाक करते हुए)
क्या, क्या, नहीं, वो, मै (हकलाते हुए)
प्रिया ने माहौल को समझ कर... (इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया वरना रीति भी चीज थी काम की...) हसते हुऐ...
क्या बकवास कर रही है तु, बिलकुल पागल है क्या।
प्रिया- बुलाऊ उसे...
क्या नहीं नहीं...(घबराते हुऐ)
प्रिया- कॉलम डाऊन बेबी..
दोनों घुमने चली जाती है...
प्रिया-(शाम को कबीर को फौन चैक करते हुऐ)
ये क्या कबाड़ भर रखा है तुमने...
कबीर क्या ...
गानों के नाम...
1)आप को देख कर देखता रह गया (जगजीत सिंह)
2)आभी जा आभी जा (चन्दन दास)
3)आज जाने की जिदद ना करों ( श्फाकत आमानत अली)
4)आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है...
5)अखियों के झरोखों से...
6)ए-हुस्न-ऐ, बेपरवा तुझे शबनम कहू सोला कहू (गुलाम अली)
7)चुपके चुपके रात दिन (गुलाम अली)
8)हम के ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद (नयारा नुर)
9)हम तेरे शहर में आऐ है मुसाफिर की तरह ( गुलाम अली)
10) इसारों इसारों मे दिल लेने वाले ( आशा जी)
11)तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे (गुलाम अला शईद)
12) ये ना थी हमारी किश्मत.......
क्या है ये सब कबीर...?
कबीर चुप...
आशिक हो गए हो...
मौका देख कर
प्रिया- (चुटकी लेते हुए...रीति को जानते हो)
कबीर- हा, क्या, कौन, कैसे, किसे, नहीं, पता नहीं (लाल-पीली शक्ल के साथ)
प्रिया- बस बस शांत भाई... (हस्ते हुऐ)
प्रिया- कैसी लगी (मजे लेते हुए)
कबीर- स्टोप इट....(हस्ते हुए)
अगले दिन—
प्रिया- कबीर मुझे शौपिंग करनी है चलोगें...
कबीर- औके...
प्रिया- रीति से शौपिंग चले (फौन पर)
रीति- कहा पेसेफिक मॉल... औके जल्दी आना...
मॉल में---(अचानक)
रीति और कबीर आमने सामने...
प्रिया (मौका देख रफूचक्कर)
रीति- हॉय....(हक्लाते हुए) (मन ही मन मिलने की खुशी को महसुस करते हुए)
कबीर- (दुनिया की सबसे हसीन लडकी को देखते हुए उसकी बातों का जवाब देना भूल गया)
रीति- कबीर कैसे हो ( दोबारा)
कबीर- हॉय/हैलो (एक साथ, खुशी से पागल)
रीति- कभी सोचा नही था ऐसे मिलेगे...
कबीर- हा बिलकुल...
(प्रिया- छुप कर देखते हुए)
कबीर- तुम कैसी हो...?
रीति- अच्छी...(सोचते हुए की कबीर ने ट्रेन मे कुछ नही कहा शायद अब कह दें)
5 मिनट तक शांति का माहौल...
कबीर- (सोचते हुए की रेल के एक सफर ने उसे हम सफर दें दिया)
आँखो मे गंगा-जमुना का पानी लिये दोनों संगम को राह तकते रहे...
12 घंटे का रेल सफर, 7 जन्मों के पवित्र सफर को बेकरार था...
आखिरकार 10 मिनट थमने के बाद पृथ्वी फिर चल पडी (बस दोनों के लिए)
कबीर- रीति (लंबी सांस लेने के बाद)
रीति- हा कबीर...
कबीर- मेरी हमसफर बनोगीं (एक झटके में)-(आँखे थोड़ी नम)
रीति- सोचतें हुए की ये कैसे हुआ, क्या हुआ,
करोड़ो के बीच खास होने का अहसास, सभी इच्छाओं का एक साथ पुरा होना, (मानों आसमां के चाँद-सितारों ने एक साथ कदम चुम लिये हो... इस से पहले रीति ने ये अहसास कभी महसुस नही किया था)
कबीर ने दोहराया- रीति मेरी हमसफर बनोंगी...?
रीति- मैं तुम्हारी ही हु.........(खुशी के इस लम्हें को एक सरल शब्द से स्वीकारते हुऐ अपनी आखिरी सासों तक का फैसला)
Tuesday, 7 June 2016
गर मर भी जाऊँ ...
गर मर भी जाऊँ.
तो युही ना फुँक देना.
मेरे अंग तरंग को किसी मे सींच देना.
तमन्ना बड़ी थी जीने की मगर.
ये साँस ही सिमित थी.
चार दिन जीने के तकदीर मे लिखी थी.
गर मर भी जाऊँ।
सींचे अंग मेरे किसी के काम आएंगे.
बेरंग दुनिया किसी की रंगों से भर जाएगी.
दौड़ेगी धड़कन किसी की.
कई बदन रंग पाएगे.
गर मर भी जाऊँ.
तो युही ना फुँक देना.
मेरे अंग तरंग को किसी मे सींच देना।
कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।
कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।