Wednesday, 29 March 2017

वो मां थी।

मैं सोता रहा, वो सहलाती रही।
मैं रोता रहा, वो चुप कराती रही।
मैं भागता रहा, वो बुलाती रही।
वो मेरी मां थी, जो सब जानती रही। 

मैं बेबस रहा, वो समझाती रही।
मैं डरता रहा, वो हिम्मत बढ़ाती रही।
मैं गिरता रहा, वो संभालती रही।
वो मेरी मां थी, जो सब जानती रही।

आज मैं उसका गौरव हूं, वो मेरी पहचान।
मैं उसकी दौलत हूं, और वो मेरा मान।।

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कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।

कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।