Wednesday, 26 July 2017

चांद ही चांद!

1) देखा तो हमने भी एक चांद करीब से,
     यकीनन उस पर दाग तो ना था।

2) चांद ही चांद है जमीं पर मगर!
     मेरे चांद का नूर है कुछ अलग।

3) ये चांद भी कुछ तुम सा है!
    कभी पूर्णिमा, कभी अमावस।

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कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।

कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।