Wednesday, 26 July 2017

चांद ही चांद!

1) देखा तो हमने भी एक चांद करीब से,
     यकीनन उस पर दाग तो ना था।

2) चांद ही चांद है जमीं पर मगर!
     मेरे चांद का नूर है कुछ अलग।

3) ये चांद भी कुछ तुम सा है!
    कभी पूर्णिमा, कभी अमावस।

Friday, 21 July 2017

वो एक लड़की और दो शहर।

जून का महीना था। अभी कुछ दिन ही बीते थे कि इंटर्नशिप की टेनसन ने माथे को धर लिया। पीछले साल तो प्रिंट मिडिया में किसी तरह जुगाड हो गया था लेकिन "अब कि बार मोदी सरकार” माफ़ करना फ्लो में निकल गया।
इस बार टाइम पर इंटर्नशिप मिलना मुश्किल लग रहा था। काहे कि हम चंट बनने के चक्कर में अपना रिज्यूमे किसी चैनल में डालें ही नहीं उपर से सैर सपाटा करने को शिवगंगा पकड़े और पुश्तैनी गांव निकल लिए।

हमारे जिगरी मित्र हैं, नाम नहीं लेंगे नहीं तो पापुलर हो जाएंगे खामखां। मिडिया स्टुडेंट है हम, सब चीजों का ध्यान रखना पड़ता है।
जो हमारे मित्र हैं वो लगें थे इंटर्नशिप कि खोज में और हम रिश्तेदारों कि खोज में।
उन्हें तो इंटर्नशिप मिल गई लेकिन हमें रिश्तेदार नहीं मिले काहे कि हम चाहते ही नहीं है किसी से मिलना थोड़े अजीब किस्म के इंसान हैं हम।

तो हुआ यूं कि हमारे मित्र जी इंटर्नशिप ज्वाईन कर लिए और रोज हमें फोन पर डेली का न्युज देने लगें। दो चार दिन तो ठीक लगा लेकिन कुछ दिन बाद महसूस हुआ कि हमारी सुलग रही है।
हमारी रिटर्न जर्नी भी क्लोज थी तो सोचे कि घर पहुंचते ही इंटर्नशिप ज्वाईन कर लेंगे। इसी लिए हम भी अपना रिज्यूमे न्युज चैनल के एचआर लोगों को चिपकाने लगे कि कोई तो हमें रख लेगा। वैसे हम बड़ी काम कि चीज़ है हीं।

अंत में दो जगहों से रिस्पांस मिला, जब प्रापर बात किए तो मालूम पड़ा कि तीन महीना मरवाना पड़ेगा। इसे ड्राप कर दिए काहे की कोर्स की डिमांड 45 दिन की इंटर्नशिप करना थी।
अब टाइम भी बित रहा था तो अपने मित्र को बोलना पड़ा कहीं इंटर्नशिप देखने को वैसे हम जल्दी किसी की हेल्प नहीं लेना पसंद करते (खुदगर्ज जो ठहरे)

मित्र जी ने अपने ही चैनल के एचआर को मेल डाला कुछ दिन बाद रिस्पांस मिला और मालुम हुआ कि आवश्यकता होगी तो मौका दिया जाएगा। यें भी बड़ा बवाल है साला।
कुछ दिन बाद कॉल आया और मिलने को बुलाया गया। और फिर क्या था अगले ही दिन से हम भी (शिवाजी राव{नायक वाले}) कि तरह 1 महीने के लिए पत्रकार बन गए।
2 दिन बाद आईं कार्ड भी मिला अपना नाम पड़ कर बहुत खुशी मिली की हम भी किसी मिडिया हाउस के तथाकथित मेंबर है, ये बात अलग है कि वह चैनल दिवालिया हो चुका था।
हमें इंटर्नशिप के पहले दिन सुबह 10 बजे न्युज रुम में लेकर जाया गया। हमारी नजरें अभी न्युज रुम को देख ही रहीं थीं की हमें टाइपिंग के लिए ऑडर मिला, शेरों-शायरी का शोक रखते हैं तो थोड़ा बहुत टाइपिंग में ठीक थें सो जल्दी ही फारिख हो गए।

फिर जैसे ही नज़रों को कंप्यूटर स्क्रीन से हटाया तो देखा एक मासूम से चेहरे वाली मृगनयनी अपने काम में डुबी हुई थी, हम एक टक उसे ही निहारने लगे।
जून की बारिश ने अपना काम कर दिया, वो नशा हमको महसूस होने लगा।
शाम तक उस चहरे को हमने कई दफा पढ़ा, और कई दफा उन आंखों में डुब कर अपनी खुदगर्जी के लम्हों को खोजा,लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, 21 साल में पहली बार कोई जरूरत महसूस होने लगी थी।
ऐसा लगा जैसे हमारा मन बोल रहा हो कि अब बस हमारी इंटर्नशिप हो चुकी, जो सीखना था सीख चुके।
अब बस एक ही काम बचा था, उन आंखों को पढ़ने का। उस चहरे को ज़हन में उतारने का। पहला दिन बीत चुका और हमे पता भी नहीं चला।

अब हर दिन जरूरी लगने लगा। घर आने से पहले ऑफिस पहुंचने की जल्दी लगने लगी थी। पर हर बीतता दिन मायूसी के सिवा कुछ नहीं था।

टाइम को मानों बुलेट ट्रेन के पहिए लग गए हों।

समय को रोकने का दिल कर रहा था, या फिर दिन को सप्ताह, सप्ताह को महिना, महिने को साल बनाने का।
30 दिन का महिना भी अब कम लग रहा था,सोचने को मजबूर होना पड़ा कि महिना 30 का ही क्यों होता है।

उससे जुड़ी कुछ चीजें जो पहले समान्य सी थी अब उनसे गहरा नाता लगने लगा। दो शहर जो महिना पहले बस एक शहर थे वो अब सदी के महानगरों में तब्दील हो चुके थे। हर लब्ज में वहीं नाम।
लग रहा था जैसे देश अब वही से चलने वाला है, जैसे राजधानी बदल दी गई हो।
वो ऑफिस जो बंद होने को था, अब देश के लिए जरूरी लगने लगा था। मानो प्रधानमंत्री वहीं बैठा करेंगे।

देखते देखते इंटर्नशिप का टाइम पुरा हो गया, यह उनका ऑफिस में आखिरी दिन था और हमारी बैचेनी का पहला। अब उन्हें रोज देखने का कोई मौका नहीं था।
यह उनका ऑफिस में आखिरी दिन था, अभी आंख भर देखा भी नहीं कि 4 बज चुके थे, वो अपना इंटर्नशिप लेटर लेने जा रहीं थी, उनका दुर जाता हर एक कदम हमारी सांसों की रफ्तार को गति दे रहा था, वो सब कुछ लेकर अपने पीजी जा चुकी थी, पर हमारा कुछ अधुरा वहीं न्युज रुम के किसी कोने में रह गया था।

यह महिने का आखिरी दिन है वो सुबह सुबह रेलवे स्टेशन को निकल चुकी थी। लेकिन हमारी हालत कुछ अलग थी, घर के कोने में बैठे थे, सांस लेना मुश्किल हो रहा था, गला भरा भरा सा था, ऐसा लग रहा था कुछ छुट रहा हो, कोई बात जो अधूरी हो, कहना जरूरी हो।

चंद घंटों में सब कुछ बदल चुका था, वो अपने घर पहुंच चुकी थी। और हमारे पास बस वो 1 महीने की याद।
ये दिन किसी गहरे जख्म कि तरह हम से चिपक गया था।
दिन बीतते गए, पर हम एक जगह अटक चुके थे। ना चाहते हुए भी हमने 24 घंटे बस उसी के बारे में सोचा, बातें की, उसे अपनी यादों में, ज़हन में ज़िंदा किए रखा।

आज 1 साल होने को है पूरा साल हमने अपने दोस्त से इसी मर्ज पर चर्चा की।
अब हर वो चीज जो उस शख्स से जुड़ी है हमें बहुत अज़ीज़ हो गई है।
चाहे वो जुन हों ,ऑफिस हों, सड़के हों, या जून की बारिश।
वो एक लड़की और दो शहर अब किसी की दुनिया हो चुके हैं।।।

Monday, 3 April 2017

आंखों में या ख्यालों में।

वो आज भी छलक जाती है.
     आंखों में है या ख्यालों में, मालुम नहीं।

Wednesday, 29 March 2017

वो मां थी।

मैं सोता रहा, वो सहलाती रही।
मैं रोता रहा, वो चुप कराती रही।
मैं भागता रहा, वो बुलाती रही।
वो मेरी मां थी, जो सब जानती रही। 

मैं बेबस रहा, वो समझाती रही।
मैं डरता रहा, वो हिम्मत बढ़ाती रही।
मैं गिरता रहा, वो संभालती रही।
वो मेरी मां थी, जो सब जानती रही।

आज मैं उसका गौरव हूं, वो मेरी पहचान।
मैं उसकी दौलत हूं, और वो मेरा मान।।

Saturday, 18 February 2017

इबादत उलफत की।

इबादत उलफत की रौजाना।
वफ़ात को एहतिमाम समझो।
~विकास

उलफत-love
वफ़ात-death
एहतिमाम-prepration

कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।

कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।