Monday, 25 July 2016

उभरने की हिम्मत...!

फिर बरसने को,वो दिन आ गए है.
हम चलतें चलतें वहीं आ गए है।
मिले थे जो कुछ, लम्हें खुशी के.
भिगोने को अब नीरद, ले नीर आ गए है।
ये थम थम कर जो हो रही है बारिश.
तबियत को तंग ये ना आज करदे।
कि अब ना रही है उभरने की हिम्मत.
इरादों ने अभ्यर्पण अब कर दिये है।

2 comments:

कैसे गुजारते ये ज़िन्दगी।

कयासों में कब तक, गुजारते ये ज़िन्दगी, हकीकत के चार लम्हें, बहुत हैं गहरी नींद को।